दोस्तों, उत्तराखंड केवल अपनी खूबसूरत वादियों, मैदानों, पहाड़ों, नदियों, हरी-भरी घाटियों और आध्यात्मिक धरोहर के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी पारंपरिक पहाड़ी रसोई के लिए भी काफी जाना जाता है। यहाँ के व्यंजन सीधे प्रकृति और स्थानीय संस्कृति से जुड़े हुए हैं। ये व्यंजन सिर्फ खाने भर के लिए नहीं होते, बल्कि इनमें पहाड़ की सरल जीवनशैली, स्वास्थ्यवर्धक सामग्री और परंपराओं की झलक देखने को मिलती है। चाहे वह मंडुआ की रोटी हो, चैंसू-भात हो या झंगोरे की खीर, हर डिश में पहाड़ की मिट्टी का स्वाद और अपनापन महसूस होता है। तो दोस्तों आज मै आपको बताने वाला हूँ उत्तराखंड के Top 10 पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन (Traditional Pahadi Recipes) जिन्हें आपको ज़रूर आज़माना चाहिए, और कमेंट में मुझे अपनी राय जरूर दे की आपको ये पहाड़ी recipe कैसी लगी।
To 10 पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन | Traditional Pahadi Recipes of Uttarakhand
1. Chainsoo (चैंसू)

Chainsoo उत्तराखंड, खासकर गढ़वाल और कुमाऊँ के हिल एरिया की एक बेहद लोकप्रिय और ट्रेडिशनल डिश है। यह ठंड में शरीर को गर्म रखने के लिए विशेष रूप से बनाई जाती है। इसे आम तौर पर चावल (भात) के साथ परोसा जाता है। जिसके कारण इसे “चैंसू-भात” के रूप में भी जाना जाता है यह काली उड़द दाल (black gram) से बनाई जाती है, जो प्रोटीन, आयरन और फोलिक एसिड का अच्छा स्रोत होती है और स्वास्थ्य के लिहाज़ से बहुत फायदेमंद मानी जाती है। पौष्टिक गुणों के कारण यह उन लोगों के लिए उपयोगी होती है जो ठंड में ऊर्जा और गर्माहट चाहते हैं।
Chainsoo बनाने की पारंपरिक विधि में सबसे पहले साबुत उड़द दाल को रोस्ट किया जाता है, फिर उसे दरदरा पीसा जाता है, इससे डिश में एक मिट्टी जैसा, गहरा स्वाद और खुशबू आती है। लोहे की कढ़ाई में पकाना इसका पारंपरिक तरीका है, जिससे स्वाद और भी बढ़ जाता है। इस डिश का स्वाद बेहद रसीला, मिट्टी जैसा और मसालों की हलकी खुशबू वाला होता है, खासकर गरम मसाला, हींग और घी/तेल के तड़के के साथ। बनावट में यह दाल गाढ़ी होती है। इसे चावल (भात) के साथ परोसा जाता है और इस संयोजन (जोड़) को “चैंसू-भात” कहा जाता है, जो स्वाद में असाधारण होता है। घी का हल्का तड़का और हरा धनिया (गार्निश) इसे और भी स्वादिस्ट बना देता है।
संक्षेप में (In Short) – चैंसू / Chainsoo
| पहलू (Aspect) | विवरण (Description) |
| उत्पत्ति (Origin) | उत्तराखंड (गढ़वाल/कुमाऊँ) के पहाड़ी इलाके से |
| मुख्य सामग्री (Ingredients) | काली उड़द दाल (Black Urad Dal), हींग (Asafoetida), गरम मसाला (Spices), तेल/घी (Oil/Ghee) |
| खास तैयारी (Special Preparation) | उड़द दाल को भूनकर (Roasted Urad Dal) लोहे की कढ़ाई में धीमी आंच पर पकाना (Cooked in Iron Kadai) |
| स्वाद और बनावट (Taste & Texture) | गाढ़ा और मिट्टी जैसा स्वाद (Earthy & Rich Flavor), मसालों की सुगंध (Aromatic Spices) |
| स्वास्थ्य लाभ (Health Benefits) | प्रोटीन, आयरन और फोलिक एसिड से भरपूर (Rich in Protein, Iron & Folic Acid) |
| परोसने का तरीका (Serving Style) | गर्मा – गर्म भात (Steamed Rice) और ऊपर से घी डालकर परोसा जाता है (Served hot with Ghee) |
2. Kafuli (काफुली)

काफुली उत्तराखंड की एक प्रसिद्ध पारंपरिक डिश है, जिसकी उत्पत्ति कुमाऊँ क्षेत्र से मानी जाती है, गढ़वाल में इसे धपड़ी (Dhapdi) के नाम से जाना जाता है। यह हरी और पौष्टिक पालक (spinach) और मेथी (fenugreek) जैसे पत्तेदार साग से बनती है, यह आमतौर पर गाढ़े सूप या करी जैसा बनता है। जिसमें चावल का पेस्ट, दही और मसाले स्वाद और गाढ़ापन लाने के लिए डाले जाते हैं। पालक और मेथी विटामिन्स, मिनरल्स और एंटीऑक्सिडेंट्स से भरपूर होते हैं, जिससे यह व्यंजन रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और पाचन सुधारने में लाभकारी माना जाता है, यहाँ तक कि डॉक्टर भी फ्लू या मौसमी संक्रमण में इसे खाने की सलाह देते हैं।
पारंपरिक विधि में उबाले और ब्लेंड किए हुए साग को सरसों के तेल में जीरा या जखिया, लहसुन, अदरक, हल्दी, धनिया पाउडर और चावल का आटा (या उड़द दाल का पेस्ट) डालकर गाढ़ा किया जाता है, जबकि दही ग्रेवी में हल्की खटास और क्रीमी स्वाद जोड़ता है। लोहे की कड़ाही में लकड़ी की आग पर पकाने से इसमें विशेष मिट्टी और स्मोकी फ्लेवर आता है। काफुली उत्तराखंड का राज्य व्यंजन (State Food) भी माना जाता है, जो थाली में सादगी और पर्वतीय संस्कृति का प्रतीक है, और इसे विशेष पर्वों तक सीमित न रखकर दैनिक भोजन में भी शामिल किया जाता है। परोसने के लिए इसे अक्सर सादा उबले चावल, मंडुआ की रोटी या बाड़ी के साथ खाया जाता है।
संक्षेप में (In Short) – काफुली / Kafuli
| पहलू (Aspect) | विवरण (Description) |
| नाम और अन्य नाम (Names) | काफुली (Kafuli); गढ़वाल में इसे धपड़ी (Dhapdi) भी कहा जाता है |
| मुख्य सामग्री (Ingredients) | पालक (Spinach), मेथी (Fenugreek leaves), जखिया/जीरा (Spices), हल्दी (Turmeric), धनिया (Coriander), चावल/दाल पाउडर (Rice/Lentil Flour), दही (Yogurt – optional) |
| पोषण (Nutrition) | विटामिन्स (Vitamins), एंटीऑक्सिडेंट्स (Antioxidants), रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला (Boosts Immunity), पाचन में लाभदायक (Good for Digestion) |
| पाक शैली (Cooking Style) | साग को उबालना (Boiled Greens) → पीसकर पेस्ट (Blended Paste) → मसाले और चावल/दाल पाउडर के साथ लोहे की कड़ाही में धीमी आँच पर पकाना (Cooked in Iron Kadai, traditionally on wood fire) |
| सांस्कृतिक महत्व (Cultural Significance) | पारंपरिक, सरल और सांस्कृतिक रूप से जुड़ा व्यंजन, पहाड़ों के रोज़मर्रा के खाने का प्रिय हिस्सा |
| परोसने का तरीका (Serving Style) | सादे चावल (Steamed Rice), मंडुआ रोटी (Mandua Roti) या बाड़ी (Baadi) के साथ परोसा जाता है |
3. Aloo Ke Gutke (आलू के गुटके)

Pahadi Aloo Gutke, उत्तराखंड की पहाड़ियों का एक क्लासिक व्यंजन है, खासतौर से Kumaon क्षेत्र का। नाम में “Aloo” का मतलब है आलू और “Gutke” का अर्थ है टुकड़े, जो Garhwal और Kumaoni भाषा में टुकड़ों को दर्शाता है। यह डिश Kumaoni परंपरा से आती है यह उत्तराखंड के Kumaon क्षेत्र में बहुत लोकप्रिय है। Garhwal और Kumaon दोनों जगह इसे पसंद किया जाता है यह अधिकतर चाय के साथ नाश्तते (snack) के रूप में या घरों में पारंपरिक भोजन के साथ परोसी जाती है। Kumaon के रोडसाइड स्थानों पर अक्सर यह “चाय के साथ स्नैक” के रूप में दी जाती है, खासकर ग्रीन चटनी, रायता और गरम चाय के साथ।
यह व्यंजन बनने में तो आसान है ही लेकिन स्वादिष्ट भी बहुत होता है, यह मसालों के साथ हल्का तड़का लगाकर बनाया जाता है इसका स्वाद मसालेदार होता है। इसे बनाने के लिए मक्खन या घी के बजाय अक्सर सरसों के तेल (mustard oil) का उपयोग किया जाता है, जो इसे एक विशिष्ट पहाड़ी फ्लेवर देता है। साथ में आमतौर पर भट्ट चटनी, Pahadi kheere ka raita या mandua ki roti परोसी जाती है, जिससे स्वाद का संतुलन बढ़ता है। यह व्यंजन साधारण पहाड़ी सामग्री से जल्दी बन जाता है, पहाड़ो पर आलू की उपलब्धता, सरल मसाले और कम संसाधनों की वजह से पहाड़ों में यह काफी लोकप्रिय है। उत्तराखंड की पहाड़ी जीवनशैली में, स्थानीय उपलब्धता और आसानी से बनने वाला यह व्यंजन गृहनिर्मित स्नैक (Homemade Snack) या साइड डिश (Side Dish) का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
संक्षेप में (In Short) – आलू गुटके / Aloo Gutke
| पहलू (Aspect) | विवरण (Description) |
| नाम (Name) | Aloo (आलू) + Gutke (टुकड़े), Kumaoni भाषा में |
| मूल क्षेत्र (Origin) | कुमाऊँ, उत्तराखंड (Kumaon, Uttarakhand), गढ़वाल में भी लोकप्रिय |
| प्रसंग (Occasion/Use) | चाय–समय का स्नैक (Tea-time Snack), पारंपरिक side-dish |
| प्रमुख स्वाद तत्व (Flavors) | सरसों के तेल (Mustard Oil) और सरल मसालों से विशिष्ट स्वाद |
| पोषण (Nutrition) | घर पर आम (Common Household Dish), जल्दी बनने वाला और किफायती (Quick & Economical) |
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4. Bhatt Ki Churkani (भट की चुड़कानी)

भट की चुर्कानी (Bhatt Ki Churkani) कुमाऊँ (Kumaon) की एक पारंपरिक डिश है, जो गढ़वाल में भी बनायीं जाती है। “भट” से आशय काले सोयाबीन (black soybeans) से है और “चुर्कानी (Churkani)” का अर्थ है एक गाढ़ी, स्टू-जैसी करी, जिसे धीमी आंच पर पकाया जाता है। यह व्यंजन उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है, जिसमें स्थानीय अनाज और साधारण सामग्री शामिल होते हैं। इसकी मुख्य सामग्री में भट (black soybeans), चावल का पेस्ट, लहसुन और अदरक होते हैं। पकाने की शैली में दानों को उबालकर चावल के पेस्ट वाली ग्रेवी में धीमी आंच पर पकाया जाता है। इसका स्वाद जमीनी (earthy), और मसालेदार होता है, जिसमें काले सोयाबीन की मिट्टी जैसी खुशबू और मसालों की गर्माहट विशेष आकर्षण है।
इसकी बनावट थिक, स्टू जैसी होती है, जहां दाल और मसाले धीरे-धीरे मिलकर एक उबलती हुई करी का रूप लेते हैं। पोषण की दृष्टि से यह व्यंजन उच्च प्रोटीन, फाइबर, लोहा और एंटीऑक्सिडेंट्स से भरपूर, कम वसा वाला, हृदय-संबंधी स्वास्थ्य के लिए उपयोगी और शरीर को गर्म रखने में सहायक है। काले सोयाबीन की खेती पहाड़ी क्षेत्रों में प्रचलित है क्योंकि यह कठोर मौसम में भी पनप सकता है। यह डिश दैनिक भोजन में और त्योहारों व पारिवारिक समारोहों में भी बनाई जाती है। स्थानीय सामग्री और सरल पाक तकनीकें इसे उत्तराखंड की पारंपरिक रसोई और स्थायी जीवन शैली का प्रतीक बनाती हैं।
संक्षेप में (In Short) – भट्ट का डुबका / Bhatt ka Dubka
| पहलू (Aspect) | विवरण (Description) |
| उत्पत्ति (Origin) | कुमाऊँ, उत्तराखंड (Kumaon Region of Uttarakhand) |
| मुख्य सामग्री (Ingredients) | भट्ट, काले सोयाबीन (Black Soybeans), स्थानीय मसाले (Local Spices) |
| स्वाद और बनावट (Taste & Texture) | गाढ़ा, मिट्टी जैसा (Thick & Earthy), मसालेदार स्टू (Spicy Stew) |
| पोषण संबंधी गुण (Nutritional) | प्रोटीन (Protein), फाइबर (Fiber), लोहा (Iron), एंटीऑक्सीडेंट्स (Antioxidants) |
| सांस्कृतिक महत्व (Cultural Significance) | रोज़मर्रा और उत्सव दोनों में खाया जाता है (Consumed in Daily Meals & Festivals), स्थानीयता और परंपरा का प्रतीक (Symbol of Local Identity & Tradition) |
5. Bhatt Ke Dubke (भट्ट के डुबके)

Dubuk (डुबुक), जिसे कुछ जगह Dubke भी कहा जाता है, उत्तराखंड और ख़ासकर कुमाऊँ क्षेत्र की पारंपरिक और लोकप्रिय डिश है, जो सर्दियों में त्योहारी मौसम, पारिवारिक मिलन और आरामदायक भोजन का प्रतीक मानी जाती है। District Almora की वेबसाइट में इसे सबसे बेहतरीन व्यंजनों में से एक बताया गया है, जो अपने “indescribable taste (अवर्णनीय स्वाद)” और पेट के अनुकूल गुणों के लिए प्रसिद्ध है। Dubuk मुख्य रूप से भट (black soybean), गहत (Horse Gram), या कभी-कभार अरहर, चना, मूंग जैसी स्थानीय दालों (pulses) से बनाई जाती है। दालों को रातभर भिगोकर पेस्ट बना लिया जाता है और फिर इसे धीमी आंच पर हल्दी, जीरा, हींग, लहसुन, अदरक जैसे मसालों के साथ पकाया जाता है। अक्सर इसे लोहे (iron) की कड़ाही में पकाया जाता है जिससे इसका स्वाद और पौष्टिकता दोनों बढ़ जाते हैं। इसकी बनावट smooth और creamy होती है, हालांकि कुछ जगह मोटा पेस्ट भी इस्तेमाल किया जाता है। इसे ज़्यादातर उबले हुए चावल (steamed rice) या मंडुआ रोटी (finger millet flatbread) के साथ परोसा जाता है, और साथ में bhang ki chutney या झोली (पहाड़ी में jholi) (yogurt curry) dish के स्वाद को और बढ़ा देते हैं।
प्रोटीन, फाइबर, आयरन, कैल्शियम और एंटीऑक्सिडेंट्स से भरपूर Dubuk स्वास्थ्य और ताकत बढ़ाने वाला भोजन है। लो-फैट और कम कैलोरी होने के कारण यह वजन घटाने और मधुमेह रोगियों के लिए भी आदर्श है। साथ ही, यह ग्लूटेन-फ्री और वेगन-फ्रेंडली है। इसमें उपयोग होने वाले मसाले जैसे हल्दी, जीरा, हींग, लहसुन और अदरक प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, पाचन सुधारने और सूजन-रोधी गुणों के लिए जाने जाते हैं। हाल के दिनों में Dubuk सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब शहरी रसोई (urban kitchens) में भी लोकप्रिय हो गया है, जहाँ इसे दिल के लिए हैल्थी भोजन (heart food) और पौष्टिक विकल्प के रूप में अपनाया जा रहा है, साथ ही फूड फेस्टिवल और रेस्तरां में भी इसे प्रमुखता से परोसा जा रहा है।
संक्षेप में (In Short) – Dubuk (डुबुक)
| विषय (Aspect) | विवरण (Description) |
| मूल पदार्थ (Ingredients) | भट, गहत या अन्य pulses (Lentils like Bhatt, Gahat, etc.), मसाले, धीरे पकाया गया पेस्ट (Slow-cooked paste with spices) |
| स्वाद (Taste) | मलाईदार और आराम देने वाला स्वाद (Creamy & Comforting) – हल्का तीखापन आपकी पसंद अनुसार (Mild spiciness as per choice) |
| तकनीक (Cooking Technique) | रातभर भिगोना (Soaked overnight) → पेस्ट बनाना (Ground paste) → धीमी आंच पर पकाना (Slow-cooked) → मसाले और स्वाद जोड़ना (Flavored with spices) |
| पोषण (Nutrition) | प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, फाइबर और एंटीऑक्सिडेंट से भरपूर (Rich in Protein, Iron, Calcium, Fiber & Antioxidants) |
| सहायक पदार्थ (Side Accompaniments) | भांग की चटनी (Hemp Seed Chutney), ज्होलि, रोटी, चावल; ठंड में गर्माहट के लिए उत्तम (Best enjoyed in winters with rice/roti) |
| सांस्कृतिक स्थान (Cultural Significance) | कुमाऊँ की पारंपरिक रसोई का अहम हिस्सा (Integral part of Kumaoni Cuisine), शीत ऋतु और त्योहारी समय में प्रिय (Popular in winters & festive occasions) |
6. Jhangora Ki Kheer (झंगोरा की खीर)

झंगोरा की खीर (Jhangora Ki Kheer) उत्तराखंड की पारंपरिक मिठाई है, जो Garhwal और Kumaon, दोनों क्षेत्रों में बनाई जाती है। यह मिठाई झंगोरा (barnyard millet), दूध, चीनी, इलायची और सूखे मेवों से तैयार होती है, जिसमें मिलेट को दूध में धीमी आंच पर पकाया जाता है जब तक यह गाढ़ी और मलाईदार न हो जाए। झंगोरा, जिसे barnyard millet या “बिलियन डॉलर ग्रास” भी कहा जाता है, उत्तराखंड की असिंचित पहाड़ी ज़मीन पर पैदा होने वाला अनाज है और यह स्थानीय जीवनशैली व कठिन परिस्थितियों में खाने-पीने की समझ का एक प्रतीक है। यह खीर खासकर त्योहारों, व्रतों (जैसे वसंत और शारदीय नवरात्र), उत्सवों और शादियों में बनाई जाती है, और आजकल तो देहरादून, मसूरी, नैनीताल जैसे शहरों के रेस्टोरेंट्स में भी शामिल हो चुकी है। स्थानीय मिलेट्स और दूध से बनने वाली यह डिश स्वास्थ्य और साधारणता का मेल दर्शाती है।
झंगोरा एक ग्लूटन-फ्री सुपरफूड है जिसमें अधिक फाइबर, आयरन, कैल्शियम, प्रोटीन और मैग्नीशियम पाया जाता है, साथ ही इसकी धीमी पचने वाली प्रकृति और ग्लूकोज़ पर कम असर इसे मधुमेह रोगियों के लिए उपयुक्त बनाते हैं। दूध के कारण इसमें प्रोटीन और कैल्शियम की भरपूर मात्रा मिलती है, और एक स्रोत के अनुसार प्रति 100 ग्राम खीर में लगभग 130 kcal, 3.6 g प्रोटीन, 1.2 g फाइबर और 15 g शुगर होती है। झंगोरा का नट्टी और मिट्टी जैसा स्वाद दूध की मलाईदारता के साथ मिलकर एक गहरा स्वाद देता है, जबकि धीमी पकाई हुई खीर की मलाईदार और गाढ़ी बनावट इसे और खास बनाती है। इलायची, केसर, नारियल और सूखे मेवे (बादाम, काजू, किशमिश) इसमें स्वाद और सौंदर्य दोनों बढ़ाते हैं। यह खीर सर्दियों में गरम और गर्मियों में ठंडी परोसी जाती है। मिलेट्स के “सुपरफूड” रूप में उभरने के कारण Jhangora Ki Kheer अब स्वस्थ भोजन प्रेमियों के बीच भी लोकप्रिय हो गई है और देहरादून, मसूरी, हल्द्वानी जैसे पर्यटन स्थलों के रेस्टोरेंट्स में स्थानीय व्यंजनों की सूची में अपनी जगह बना चुकी है।
संक्षेप में (In Short) – Jhangora Ki Kheer (झंगोरा की खीर)
| पहलू (Aspect) | विवरण (Description) |
| संस्कृति (Culture) | पर्वतीय संस्कृति और पहाड़ी जीवनशैली को दर्शाती है। (Represents Himalayan culture & lifestyle) |
| सेहत (Health) | पोषक, ग्लूटन-फ्री, मधुमेह-उपयुक्त। (Nutritious, Gluten-free, Diabetes-friendly) |
| स्वाद व बनावट (Taste & Texture) | क्रीमी, नट्टी, सूखे मेवों और मसालों की तड़केदार प्रस्तुति। (Creamy, Nutty, Garnished with dry fruits & spices) |
| प्रसार (Popularity/Reach) | स्वास्थ्य और पर्यटन के क्षेत्र में (health & tourism sector) |
7. Mandua Ki Roti (मंडुआ की रोटी)

Mandua Ki Roti (मंडुआ की रोटी) उत्तराखंड के Garhwal और Kumaon क्षेत्रों की पारंपरिक रोटी (flatbread) है, जो मंडुआ या रागी (finger millet) के आटे से बनाई जाती है। इसे mandua flour, water और salt से तैयार किया जाता है, गुँथा हुऐ आटे (dough) को बेलकर गरम तवा पर पकाया जाता है और अक्सर घी के साथ परोसा जाता है। ठंड के दिनों में यह रोटी पहाड़ो पर काफी लोकप्रिय है, जब ठंड ज्यादा होती है और ऊर्जा की ज्यादा ज़रूरत होती है। मंडुआ (finger millet) हिमालयी तूफान में और काफी ऊँचाई पर आसानी से उगने वाला अनाज है, जिसे कम पानी की ज़रूरत होती है और यह कठिन मौसम में भी टिकने की क्षमता रखता है, इसलिए इसे स्थानीय खेती एवं आत्मनिर्भरता का प्रतीक माना जाता है। Gluten-free होने की वजह से यह उन लोगों के लिए उपयुक्त है जिन्हें ग्लूटेन से समस्या होती है, जैसे कि Celiac (Celiac disease is a digestive and immune disorder that damages the small intestine) रोगी। इसमें fiber, calcium, iron और complex carbohydrates प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो पाचन, हड्डियों की मजबूती और लंबे समय तक ऊर्जा देने के लिए जरूरी हैं। Low glycemic index के कारण यह diabetics के लिए भी बेहतर माना जाता है और blood sugar levels को स्थिर रखने में मदद करता है।
इसका स्वाद मिट्टी जैसा (earthy) और अखरोट (nutty) जैसा होता है, जो गेहूं की रोटी (wheat roti) से बिल्कुल अलग होता है, जबकि इसकी बनावट थोड़ी मोटी और घनी (dense) होती है क्योंकि इसमें gluten नहीं होता और गुँथा हुआ आटा (dough) ज्यादा लचीला नहीं होता, इस वजह से रोटी मोटी ही बनती हैं। Mandua Ki Roti सिर्फ खाने की चीज नहीं बल्कि पहाड़ी संस्कृति, परंपरा और भूमि से गहरा जुड़ाव का एक प्रतीक है। यह अक्सर सामुदायिक खाना बनाना (communal cooking) का हिस्सा होती थीं, जब परिवार और समुदाय मिलकर इन्हें बनाते और साथ बैठकर साझा करते है। त्योहारों या फसल उत्सव (harvest celebrations) में भी मंडुआ की रोटी का विशेष महत्व रहा है, खासकर (समृद्धि) prosperity और स्वास्थ्य के प्रतीक के रूप में। पारंपरिक रूप से इसे ghee या butter के साथ गरमागरम परोसा जाता है, जो स्वाद में richness और गर्मी (warmth) जोड़ता है, और इसके साथ Bhatt Ki Daal, Aloo Tamatar Jhol जैसी मौसमी करी (seasonal curries), chutney या दही (yogurt) परोसी जाती हैं।
संक्षेप में (In Short) – Mandua Ki Roti (मंडुआ की रोटी)
| गुण (Aspect) | विवरण (Description) |
| आहारिक मूल्य (Nutritional) | Fiber, Calcium, Iron और Complex Carbs से भरपूर, Gluten-free और Low Glycemic Index वाली रोटी |
| स्वाद व बनावट (Taste & Texture) | Earthy और Nutty flavor; गेहूं की रोटी से मोटी और घनी बनावट (Dense texture) वाली |
| संस्कृति और स्थानीयता (Cultural Significance) | पहाड़ी खेती और आत्मनिर्भरता का प्रतीक, त्योहारों और सामूहिक आयोजनों में खास जगह |
| परोसने की शैली (Serving Style) | Ghee या Butter के साथ, Seasonal Curries और Traditional Chutneys के साथ परोसी जाती है |
8. Gahat Ki Dal (गहत की दाल)

गहत की दाल (Gahat Ki Dal), जिसे “Kulath” या अंग्रेज़ी में “Horse Gram” भी कहा जाता है, उत्तराखंड की पहाड़ी संस्कृति का एक अहम हिस्सा है और Kumaoni और Garhwali भोजन विधियों में यह विशेष स्थान रखती है। Gahat dal एक उच्च-प्रोटीन और फाइबर से भरपूर दाल है। Mayuri’s Jikoni के अनुसार यह दाल भूख हार्मोन (ghrelin) को दबाने में मदद करती है, इसलिए वजन नियंत्रित करने वालों के लिए यह दाल लाभकारी मानी जाती है। इसका नाम “Horse Gram” इसलिए पड़ा क्योंकि इसकी फेडी (whole legume seeds) अक्सर पशुओं को खिलाई जाती थी।
Fun FOOD Frolic की रेसिपी में इसमें स्थानीय हर्ब्स जैसे “Jumbu (Jimbu)” और “Gandrain” का उपयोग किया जाता है, जो इसे अद्वितीय पहाड़ी खुशबू और स्वाद देते हैं। पारंपरिक रूप से गहत को धीमी आंच पर पकाया जाता है और उसमें चावल का आटा (rice flour slurry) मिलाया जाता है, जिससे दाल मलाईदार और गाढ़ी बनती है, जबकि घी का तड़का इसके स्वाद और सुगंध को और बढ़ा देता है। यह व्यंजन प्रायः “Pahadi Lai Ki Sabzi” (पहाड़ी सरसों की साग) के साथ परोसा जाता है, जो मिलकर एक उम्दा पहाड़ी भोजन का अनुभव प्रदान करता है।
संक्षेप में (In Short) – गहत / Gahat (Kulath)
| पहलू (Aspect) | विवरण (Description) |
| नाम (Name) | गहत (कुलथ) / Gahat (Kulath) / Horse Gram |
| उत्पत्ति (Origin) | उत्तराखंड (गढ़वाल/कुमाऊँ) की पारंपरिक पहाड़ी रसोई (Traditional Kitchen of Kumaon & Garhwal, Uttarakhand) |
| पोषण तत्व (Nutritional) | उच्च-प्रोटीन (High Protein), फाइबर (Rich in Fiber), भूख नियंत्रक गुण (Appetite Control) |
| विशेष सामग्री (Special Ingredients) | स्थानीय हर्ब्स (जिम्बू, गंड्रेन), चावल का आटा (Rice Flour), घी (Ghee) |
| पाकशैली (Cooking Style) | धीमी आंच पर पकाया जाता है (Slow-cooked), मलाईदार बनावट (Creamy Texture), पहाड़ी स्वाद (Rustic Flavor) |
| परंपरागत संगत (Traditional Pairing) | Pahadi Lai ki Sabzi और भात (Steamed Rice) के साथ परोसा जाता है |
9. Singori (सिंगोड़ी)

Singori (सिंगोड़ी) Kumaon की एक अनोखी मिठाई है जो खासतौर पर Almora और Tehri Garhwal से जुड़ी हुई है। दोस्तों माना जाता है कि इसका आरंभ टिहरी (Tehri Garhwal) से हुआ था और यह कई महाराजाओं की पसंदीदा थी। ScoopWhoop की एक रिपोर्ट के अनुसार, Almora के रास्ते में “Khairna” नामक जगह के छोटे ढाबों से यह मिठाई काफी लोकप्रिय हुई थी। कहते हैं कि एक ब्रिटिश यात्री ने Khairna के ढाबे से यह मिठाई खाई, जो पहले दिन स्वादिष्ट लगी, लेकिन जब अगले दिन इसे बिना पत्ते के दिया गया तो वो स्वाद से प्रभावित नहीं हुआ। तब दुकानदार ने खोए और नारियल चूरा युक्त मिश्रण को मालू (Bauhinia variegata) के पत्ते में शंकु (cone) के रूप में लपेटा और स्वाद फिर से लाजवाब हो गया।
इसके बाद से पत्ते में लपेटना Singori की खास पहचान और परंपरा बन गया। इस मिठाई की मुख्य सामग्री खोया (milk solids) है, जिसमें नारियल चूरा, बादाम, काजू, किशमिश और इलायची पाउडर मिलाया जाता है। मालू (Bauhinia variegata) के पत्ते से इसे एक विशेष खुशबू और स्वाद मिलता है, जो इसे और भी अनोखा बनाता है। Singori Kumaon क्षेत्र में शादी, त्योहार और पारिवारिक समारोहों में परंपरागत रूप से बनाई और परोसी जाती है और यह व्यंजन Kumaoni संस्कृति में मिठास और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
संक्षेप में (In Short) – Singori (सिंगोड़ी)
| पहलू (Aspect) | विवरण (Description) |
| क्षेत्र (Region) | कुमाऊँ, अल्मोड़ा और टिहरी गढ़वाल |
| सामग्री (Ingredients) | खोया (Khoya), नारियल चूरा (Coconut Powder), बादाम (Almonds), काजू (Cashews), किशमिश (Raisins), इलायची पाउडर (Cardamom Powder) |
| पैकेजिंग (Packaging) | मालू के पत्ते में शंकु जैसे लपेटा जाता है |
| खासियत (Speciality) | पत्ते से आती अनोखी सुगंध और स्वाद (Unique aroma & flavor from the leaf), इसी कारण इसे “पत्ते वाली मिठाई” कहा जाता है |
| मौका (Occasions) | त्यौहार, शादी-विवाह और सांस्कृतिक उत्सवों में परोसी जाती है (Served during festivals, weddings & cultural celebrations) |
10. Baadi (बाड़ी)

Baadi (जिसे कभी-कभी “बड़ी” भी कहते हैं) उत्तराखंड के खासकर कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्र की एक रूढ़िवादी, साधारण लेकिन बेहद पौष्टिक डिश है, जिसे आम तौर पर finger millet (Mandua/रागी/चून) के आटे से बनाया जाता है। पकने के बाद यह नरम, गूंथे हुए मिश्रण (dough) का रूप ले लेती है, जिसमें बहुत कम सामग्री उपयोग होती है, कभी-कभी थोड़ा नमक या घी मिलाया जाता है। Baadi को अकेले नहीं खाया जाता, बल्कि इसे अक्सर Phaanu (मिश्रित दालों की गाढ़ी दाल), Gahat (Kulath) दाल, Jakhya Aloo (जख्यां आलू) और अन्य स्थानीय चटनी/सब्जियों के साथ परोसा जाता है, जो इसे स्वाद और संतोष से भरपूर बना देता है। Mandua से बनी होने के कारण यह ऊर्जावान और संतोषजनक (तृप्तिदायक) होती है, जिसमें calcium, iron और fiber की अच्छी मात्रा पाई जाती है।
यह ग्लूटेन मुक्त है, इसलिए उन लोगों के लिए भी उपयुक्त है जो ग्लूटेन से बचते हैं, साथ ही ठंडी जलवायु में इसके गर्माहट देने वाले गुण इसे सर्दियों में विशेष रूप से लोकप्रिय बनाते हैं। Baadi स्थानीयता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है क्योंकि इसमें इस्तेमाल होने वाला आटा और साथ में परोसे जाने वाले व्यंजन स्थानीय रूप से उगाए या उपलब्ध होते हैं, और यह कुमाऊँ-गढ़वाल की ग्रामसभाओं में रोज़मर्रा के भोजन के रूप में पीढ़ियों से संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी रही है। आधुनिक समय में इसमें grated vegetables जैसे गाजर और पालक मिलाकर इसे रंगीन और पौष्टिक बनाया जा रहा है, साथ ही ज्वार या बाजरा जैसे अन्य मिलेट्स मिलाकर भी विविधता दी जाती है, वहीं गर्मियों में इसे दही या छाछ के साथ परोसकर ठंडा, हल्का और ताज़गीपूर्ण विकल्प बनाया जाता है।
संक्षेप में (In Short) – Baadi (बाड़ी)
| पहलू (Aspect) | विवरण (Description) |
| साधारण पर प्रभावशाली (Simple yet Fulfilling) | केवल मांडवा/फिंगर मिलेट आटा (Finger Millet Flour), पानी और कभी-कभी घी – हमेशा गाढ़ा, नरम और पेट भरने वाला (Thick, soft & filling). |
| पोषण से भरपूर (Nutritionally Rich) | कैल्शियम, आयरन, फाइबर से भरपूर (Rich in Calcium, Iron & Fiber), ग्लूटेन-फ्री और तुरंत ऊर्जा देने वाला (Gluten-free & energy boosting). |
| स्थानीय और पारंपरिक (Local & Traditional) | कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्रों की स्थानीय सामग्री से तैयार |
| लचीला (Versatile) | शाकाहारी, हेल्दी और आधुनिक स्वादों/सामग्री के साथ आसानी से अनुकूल (Vegetarian, healthy & adaptable with modern flavors/ingredients). |
क्यों खास हैं पहाड़ी व्यंजन? | Why Pahadi Recipes are Special?
पहाड़ी व्यंजन सिर्फ खाने की थाली और पेट भरने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये स्वाद, पोषण और संस्कृति का संतुलन हैं।
- स्थानीय सामग्री से बने: अधिकतर व्यंजन स्थानीय अनाज, दालें और पत्तेदार सब्जियों से तैयार होते हैं।
- सेहतमंद और पौष्टिक: इनमें प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम और फाइबर भरपूर होते हैं।
- परंपरागत स्वाद: पहाड़ी चूल्हे, लकड़ी की आग, लोहे की कढ़ाई और पहाड़ी मसालों से पकाने के कारण इसका अलग ही स्वाद होता है।
- मौसमी संतुलन: सर्दियों में शरीर को गर्म रखने वाले और गर्मियों में शरीर को हल्का-ठंडापन देने वाले व्यंजन।
- संस्कृति से जुड़ाव: ये सारी डिशेस किसी न किसी त्योहार, परंपरा या सामुदायिक आयोजन का हिस्सा रही है।
- ग्लूटन-फ्री और नेचुरल: मंडुआ, झंगोरा और गहत जैसे अनाज ग्लूटन-फ्री और डाइजेशन फ्रेंडली होते हैं।
- सरलता में स्वाद: कम सामग्री और साधारण तकनीक के बावजूद लाजवाब स्वाद।
प्रश्न–उत्तर (FAQs)
Q1. पहाड़ी खाने में सबसे लोकप्रिय डिश कौन-सी है?
Ans. आलू के गुटके, चैंसू-भात और झंगोरे की खीर सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं।
Q2. मंडुआ की रोटी को खास क्यों माना जाता है?
Ans. यह ग्लूटन-फ्री होती है और इसमें कैल्शियम व आयरन भरपूर होता है, इसलिए सेहत के लिए फायदेमंद है।
Q3. क्या पहाड़ी व्यंजन रोज़मर्रा में खाए जाते हैं या सिर्फ त्योहारों पर?
Ans. दोनों। कुछ व्यंजन जैसे गहत की दाल और आलू के गुटके रोजाना बनाए जाते हैं, जबकि सिंगोड़ी जैसी मिठाई त्योहारों और शादियों पर।
Q4. क्या पहाड़ी खाने में मांसाहारी डिश भी शामिल हैं?
Ans. हाँ, लेकिन यह लेख खासकर शाकाहारी और पारंपरिक व्यंजनों पर केंद्रित है।
Q5. क्या ये सभी व्यंजन आसानी से घर पर बनाए जा सकते हैं?
Ans. जी हाँ, ये साधारण सामग्री और बेसिक पकाने की विधि से आसानी से बनाए जा सकते हैं।
Q6. पहाड़ी व्यंजनों का सेहत पर क्या असर होता है?
Ans. ये व्यंजन शरीर को ऊर्जा, गर्माहट और पोषण देते हैं। खासकर सर्दियों में बहुत फायदेमंद माने जाते हैं।
Q7. झंगोरे की खीर इतनी खास क्यों है?
Ans. क्योंकि यह झंगोरा (barnyard millet) से बनती है, जो ग्लूटन-फ्री सुपरफूड है और सेहत व स्वाद दोनों में बेहतरीन है।
निष्कर्ष (Conclusion)
दोस्तों, पहाड़ी व्यंजन सिर्फ खाने-पीने और पेट भरने का ज़रिया नहीं है, बल्कि संस्कृति, परंपरा, ऊर्जा और स्वास्थ्य का संयोजन (संगम/जोड़) हैं। इनमें प्रकृति की सादगी झलकती है। चाहे बात मंडुआ की रोटी की हो, काफुली की या झंगोरे की खीर की, हर व्यंजन (recipe) हमें यह याद दिलाती है कि असली स्वाद साधारणता में ही छिपा होता है। अगर आप उत्तराखंड की असली पहचान को समझना चाहते हैं, तो इन पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद ज़रूर चखिए और हमे कमेंट बॉक्स में अपनी राय अवस्य दे। धन्यवाद











Bahut sundar 👏
Bahut-bahut dhanyavaad 🙏
Aapko pasand aaya, humein bahut khushi hui.